Giriraj Govardhan ब्रज भूमि का वह पवित्र पर्वत है जिसे स्वयं भगवान श्रीकृष्ण का स्वरूप माना जाता है। ब्रज में कहा जाता है —
“गिरिराज धरन की जय!”
मान्यता है कि श्रीकृष्ण ने इंद्र के अभिमान को तोड़ने के लिए सात दिनों तक अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर ब्रजवासियों की रक्षा की थी। इसी घटना को गोवर्धन लीला कहा जाता है और यह कथा कई पुराणों में वर्णित मिलती है।

📜 पुराणों में Giriraj Govardhan का वर्णन
गोवर्धन पर्वत की महिमा मुख्य रूप से इन ग्रंथों में मिलती है:
- श्रीमद्भागवत महापुराण (दशम स्कंध)
- गर्ग संहिता
- स्कंद पुराण – ब्रज खंड
- हरिवंश पुराण
इन ग्रंथों के अनुसार गोवर्धन पर्वत कोई साधारण पहाड़ी नहीं, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण का दिव्य स्वरूप है।
🌿 Giriraj Govardhan पर्वत की उत्पत्ति (Puranik Story)
पुराणों के अनुसार गोवर्धन पर्वत का जन्म द्रोणाचल पर्वत के पुत्र के रूप में हुआ था।
कथा के अनुसार:
- द्रोणाचल हिमालय के पास स्थित एक महान पर्वत था
- उसके पुत्र का नाम गोवर्धन था
- वह अत्यंत सुंदर, हरे-भरे वन और पवित्र जल से भरा हुआ था
एक समय महर्षि पुलस्त्य (रावण के दादा) ब्रज आए और उन्होंने गोवर्धन पर्वत को देखकर कहा:
“यह पर्वत अत्यंत पवित्र है, मैं इसे अपने आश्रम लंका के पास ले जाना चाहता हूँ।”
द्रोणाचल ने शर्त रखी कि यदि रास्ते में पर्वत को नीचे रखा गया तो वह वहीं स्थिर हो जाएगा।
कहते हैं कि जब पुलस्त्य ऋषि ब्रज पहुँचे, तब भगवान कृष्ण की इच्छा से उन्होंने गोवर्धन को नीचे रख दिया और वह ब्रज भूमि में स्थायी रूप से स्थापित हो गया।

🪔 श्रीकृष्ण और Giriraj Govardhan पूजा की कथा
एक बार ब्रजवासी हर वर्ष इंद्र देव की पूजा करते थे ताकि वर्षा अच्छी हो।
लेकिन श्रीकृष्ण ने कहा:
“हमें इंद्र की नहीं, बल्कि गोवर्धन पर्वत और प्रकृति की पूजा करनी चाहिए, जो हमें भोजन और आश्रय देती है।”
ब्रजवासियों ने कृष्ण की बात मान ली और गोवर्धन पूजा की।
इससे इंद्र क्रोधित हो गए और उन्होंने भयंकर वर्षा शुरू कर दी।
तब भगवान कृष्ण ने:
- अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठाया
- सभी ब्रजवासियों और गायों को उसके नीचे आश्रय दिया
- सात दिनों तक लगातार वर्षा से रक्षा की
अंततः इंद्र को अपनी भूल का अहसास हुआ और उन्होंने श्रीकृष्ण से क्षमा माँगी।
इसी घटना के कारण गोवर्धन पर्वत को “गिरिराज” यानी पर्वतों का राजा कहा जाता है।
🕉️ Giriraj Govardhan पर्वत क्यों माना जाता है श्रीकृष्ण का स्वरूप
वैष्णव परंपरा में माना जाता है कि:
- गोवर्धन पर्वत कृष्ण का प्रत्यक्ष स्वरूप है
- इसकी हर शिला को शालिग्राम के समान पवित्र माना जाता है
- इसे “हरिदेव का शरीर” कहा जाता है
ब्रज में भक्त कहते हैं:
“गोवर्धन शिला स्वयं श्रीकृष्ण हैं।”
इसलिए भक्त गोवर्धन की शिला को घर में भी स्थापित करते हैं।
🚶♂️ Giriraj Govardhan परिक्रमा का महत्व
गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है।
📏 परिक्रमा दूरी
लगभग 21 किलोमीटर
📍 मुख्य स्थान
परिक्रमा के दौरान कई पवित्र स्थल आते हैं:
- दानघाटी मंदिर
- मानसी गंगा
- राधा कुंड
- श्याम कुंड
- कुसुम सरोवर
- पुंचरी का लोटा
भक्त नंगे पैर चलकर “गिरिराज जी की जय” बोलते हुए परिक्रमा करते हैं।
📅 Giriraj Govardhan पूजा और अन्नकूट उत्सव
दीपावली के अगले दिन गोवर्धन पूजा मनाई जाती है।
इस दिन:
- भगवान को 56 भोग (छप्पन भोग) लगाया जाता है
- मंदिरों में अन्नकूट उत्सव होता है
- भक्त गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करते हैं
ब्रज में यह त्योहार बहुत भव्य रूप से मनाया जाता है।
🌄 आज का गोवर्धन पर्वत
आज गोवर्धन पर्वत उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में स्थित है और हर साल लाखों श्रद्धालु यहाँ आते हैं।
यह स्थान:
- मथुरा से लगभग 22 किलोमीटर दूर है
- वृंदावन से लगभग 25 किलोमीटर दूर है
यह ब्रज की सबसे महत्वपूर्ण तीर्थ स्थलों में से एक माना जाता है।
✨ निष्कर्ष
गोवर्धन पर्वत केवल एक पहाड़ी नहीं, बल्कि ब्रज की आध्यात्मिक पहचान है।
यह वही स्थान है जहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने प्रकृति की महिमा और अहंकार के विनाश का संदेश दिया।
आज भी लाखों भक्त श्रद्धा से कहते हैं:
“गिरिराज महाराज की जय!”
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